एकांत रास

पलों के अंतराल में
काल-खंड लुप्त था।
सांसों में जीवन के
एक ज्योति-पुंज था।
बांसुरी की धुन में
सकल व्योम तृप्त था।

तारें टूटते,
जमीं शांत थी।
शून्य में गूंजता था अनंत,
आत्मा अधीर थी।

यमुना की धारा में
संघनित तृप्ति थी।
खोये सुध-बुध सब
जगती प्रकृतिष्ठ थी।

आओ एक बार कान्हा
मन के दिगान्त में,
सुप्त प्राण-राधा से
रास हो एकांत में!

-रघुवीर

मैं हर कहीं हूँ!

पढ़ी गयी उनकी रचनायें,
सस्वर, मंच से।
तालियाँ बजी।
गड़गड़ाहट मिलों गयीं।
वाह! वाह!! से सभा
गुंजायमान हो उठा।
कवि की रूह
आसमान से उतर,
एकदम से पिछली कतार में बैठी
एक बृद्धा के चेहरे की झुर्रियों में समा गई।
कहना मुश्किल था कि पहले कौन आया-
लवों पे मुस्कान, या आँखों में पानी?

माँ, मैं अब भी जिंदा हूँ,
शब्दों में हूँ, अनुभूतियों में हूँ,
उन तरंगों में हूँ, जो आत्माओं को टटोलती
शिराओं में उतर जाती हैं।
तुम मुझे खोजने आयी थी, देखो
मैं हर कहीं हूँ।

-रघुवीर